दो शब्द , हमारे रिश्ते को

जब मैं बलाका में शिफ्ट हुई, तब केवल परिवार के नाम पर हम दो ही थे पति-पत्नी। एक दिन जब मैं आफिस जाने के लिए निकल रही थी, तो यानी नीचे की तरफ सीढ़ी से उतर रही थी तो एक सज्जन दिखें। वे मुझे देखकर एक अच्छी सी बड़ी सी स्माइल किये, और बोले कि मेरा गैस सिलेंडर आने वाला है और मेरे पास अभी रुपये नहीं है। क्या आप मुझे 500 रुपये दे सकती हैं। मैं उनको पहचानती नहीं थी। आज के पहले देखी भी नहीं थी इसलिए मुझे कुछ अटपटा-सा लगा। मैं सोचने लगी कि क्या करूँ किसी को ना करना अच्छा नहीं लगता। लेकिन उनको जानती नहीं हू इसलिए रुपये देने में भी हिचकिचाहट हो रही थी। लेकिन उनका व्यक्तित्व इतना जबरदस्त था कि क्या बताऊँ, ऊँचा कद, हैंडसम व्यक्तित्व, उम्र 65 के पार होगी, लेकिन उम्र का कोई असर नहीं, बल्कि एक युवा के बगल में खड़ा कर दिया जाए तो भी यहीं बीस लगेंगे। बातचीत में इतने शालीन कि विनम्र होकर बोले कि आप घबराइये नहीं, मेरा फ्लैट नीचे है। मैं आपको शाम को रुपया वापस कर दूंगा। मैं बोली कि रुपये तो अभी मेरे पास नहीं है,. ठीक है घर जाकर लाकर देती हूँ। और फिर शाम को जब मैं आफिस से आई और उसके तुरंत बाद ही वह 500 रुपये लेकर हमारे घर आ गये। हमलोग साथ में चाय़ पिये और बहुत सारी बातें हुई। यह था हमारे रिश्ते, हमारे अपनेपन की शुरुआत। मैं अलग धर्म से थी, और वह अलग धर्म से। लेकिन हमारे रिश्ते गहरे होते गये। बाद में आंटी, और दोनों बच्चों से भी गहरा रिश्ता हो गया। ऐसा रिश्ता जो दिल से जुड़ गया, परिवर बन गया। मुझे एक ऐसा परिवार मिल गया जहाँ अंकल-आंटी, भाई-बहन सब मिल गये और उन सब को हम दोनों मिलें और उसके बाद बेटियाँ भी जुड़ गईं। उनकी आवाज, उनका व्यक्तित्व हमेशा आकर्षित करता। हम दोनों परिवार सुख-दुख के साथी बन गये। हमलोग एक दूसरे के पर्व-त्यौहार पर शामिल होने लगे। उनके दोनों बच्चों की पढ़ाई खत्म हुई, शादी हुई। दोनों की शादी में हमलोगों को निमंत्रण दिया गया, लेकिन शादी दूसरे शहर में थी, इसलिए हमलोग जा नहीं पाये। दूरी और व्यस्तता की वजह से। लेकिन दोनों की शादी में ही मुझे रिश्तेदारों की तरह उपहार मिला। धीरे धीरे हम उनके परिवार का ही हिस्सा बन गये। हमारे धर्म और उम्र हम दोनों परिवार के बीच कोई व्यवधान नहीं कर पाया। सबसे बड़ी बात है कि वह मुझसे बहुत बड़े होने के बावजूद हमेशा मुझे जी, आप कह कर संबोधन करते थे। मैं कई बार बोली कि मैं आपसे बहुत छोटी हूँ, आज मुझे आप मत बोला कीजिए, तब वह कहते नहीं नहीं आप उम्र में छोटी है लेकिन सम्मान के योग्य हैं इसलिए मैं आपके लिए सम्मानजनक शब्द का उपयोग करता हूँ और वह बार मुझे ऐसे ही बात करते रहें। वह दूसरे धर्म के थे, उनके बहुत मित्र, रिश्तेदार हैं, लेकिन उन्होंने जो मुझे इज्जत, सम्मान दिये उनको मैं जीवन में कभी भूल नहीं सकती, उनके नाती, पोता-पोती होने पर उस घर में मुझए बुआ और मौसी का अधिकार दिया गया। पारिवारिक अनुष्ठआन में मैं बच्चों को काजल लगाई और एक और रिश्ते में जुड़ गई। मैं समझ नहीं पाई कि मुझ जैसे सामान्य किसी ने नहीं दिया, जितना उन्होंने दिया। उनके परिवार ने दिया। मैं तो इसी से अभिभूत थी, लेकिन मेरे जीवन में उनकी तरफ से और सम्मान और अपनापन बाकी था। पारिवारिक रिश्ता बढ़कर सामाजिक होगा, मुझे पता नहीं था। लेकिन मेरे जीवन में वह दिन भी आया। उनके बेटे को छोटे बेटे का अन्नप्रासन बड़े स्तर पर आयोजन किया गया है। मैं बोली कि आऊँगी तो जरूर। लेकिन फोन पर जब सूचना दी गयी तो कहा गया कि तुम्हीं आकर बच्चे को खिलाओगी। मैं बोली इतने बड़े समारोह में मुझे बहुत अजीब सा लगेगा। और उसके बाद मेरी बड़ी बेटी का ट्यूशन है वह वहाँ से जब लौटकर आयेगी, तब ही आ पाऊँगी। इसीलिए मुझे यह मौका मत दीजिए लेकिन वह बोले कि ठीक है आप आइए, मैं उस दिन बहुत देर से कार्यक्रम में पहुँची और मुझे लगा कि अन्नप्रासन हो गया होगा। लेकिन नहीं। इतने बड़े समारोह में मेरा इंतजार हो रहा था। मैं मुख्य अतिथि के रूप में पहुँची। वहाँ सभी उपस्थित लोग मेरा नाम जान गये थे। मेरा इंतजार कर रहे थे। जब मैं पहुँची तो सब लोग कहने लगे कि आप ही रेखा श्रीवास्तव है। हमलोग कब से आपका इंतजार कर रहे थे। मैं उस नन्हें से बच्चे को गोद में लेकर अन्नप्रासन की विधि संपन्न की। सचमुच उस पल मैं खुद को बहुत गर्वित महसूस कर रही थी, और आंखों से आंसू बहने ही वाले ही थे कि मैंने खुद को कंट्रोल कर लिया। इतना सम्मान, इतनी इज्जत बहुत बड़ी बात थी मेरे लिए। परिवार के एक-एक सदस्य ने मुझे सम्मान किया। हाँ, एक और बात बताऊँ जब मेरी बड़ी बेटी होने वाली थी, और मैं घर पर ही रह रही थी तो एक दिन शाम को उनका फोन आया और बोले कि तुम्हें कुछ खाने का मन कर रहा है तो बोलो ला देता हूँ। मैं बोली कि नहीं मुझे कुछ नहीं खाना है, वह बोले ऐसे समय में कुछ भी खाने का मन करता है, और आप बोल सकती है। मैं कुछ नहीं बोल पा रही थी वह बोले कि मैं आपके लिए रोल लेकर आ रहा हूँ और वह शाम को धर्मतल्ला से मेरे लिए रोल लेकर आ गये। इसी तरह एक बार वह अपनी बेटी के लिए शॉल लाये तो मेरे लिए भी ले लाए। मसलन, कभी वह माँ बन जाते, तो कभी पिता, मसलन एक रिश्ते में सब रिश्ता। लेकिन हर चीज का अंत होता है, वैसे ही हमारे रिश्ते का भी अंत हो गया। कल यानी 9 जुलाई 2025 को 8 बजकर 40 मिनट (रात) में वह नये यात्रा में चले गये। वह जाना तो नहीं चाहते होंगे, लेकिन जाना तो है इसीलिए निकल पड़े । लेकिन लगभग 20 साल के इस रिश्ते में मुझे बहुत कुछ दे गये। जैसे सब दे जाते हैं। जैसे पापा दे गये। माँ दे गईं। उत्तम भैया दे गये। ठीक वैसे ही बहुत कुछ दे गये हैं। उनकी पर्सनलिटी, उनकी आवाज, उनका इज्जत देने वाला व्यवहार, उनके जैसी दृढ़ शक्ति, दृढ़-इच्छा, सकारात्मक ऊर्जा, अपनापन, प्यार, और भी न जाने कितना कुछ दे गये हैं हमको। जब तक जीऊँगी, मेरे पास रहेगा। जब-जब हमारे यहाँ यह खबर आती है कि किसी लड़की का बलात्कार हुआ है, तो मेरा मन पुरुषों के प्रति घृणा, नफरत से भर जाता है। समझ नहीं पाती हूँ कि पुरुष इतने कितने स्वार्थी हो सकते हैं, कि अपने क्षणिक सुख के लिए किसी लड़की का बलात्कार कर देते हैं। और सबसे बड़ी बात है कि हमारे समाज में बलात्कार केवल लड़कियों, महिलाओं का होता है। कभी आपने सुना है कि पुरुषों का बलात्कार हुआ है। क्यों पुरुषों का बलात्कार क्यों नहीं होना चाहिए। जब मैं छोटी थी, तो पुरुषों से खास लगाव था। मसलन भैया, चाचा, मामा और ममेरे भाई, और साथ में खेलने वाले लड़के दोस्त। यह अलग बात है कि इसमें से कुछ की नजरें अलग दिखती थी, लेकिन फिर भी मैं भैया प्रेमी थी। अपने तीन-तीन भाइयों के साथ साथ बहुत सारे भाई मिले थे। उनसे खास प्यार, लगाव था। ऐसे में पुरुषों से ज्यादा लगाव था, महिलाओं की तुलना में।

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