सीआईडी की यादें: एक ऐसा सीरियल, जो आज भी दिल में बसा है
सीआईडी के निर्माता बी. पी. सिंह के निधन की खबर के बाद आज फेसबुक पर राहुल मिश्रा की एक विस्तृत पोस्ट पढ़ने का मौका मिला। उस पोस्ट से सीआईडी के बारे में कई ऐसी जानकारियाँ मिलीं, जिनके बारे में पहले नहीं जानती थी। पोस्ट पढ़कर सीआईडी की पुरानी यादें फिर से ताजा हो गईं। मन में आया कि क्यों न इस सीरियल के बारे में कुछ लिखा जाए। बस, कोशिश कर रही हूँ। पता नहीं कितना लिख पाऊँगी और कैसा लिख पाऊँगी, लेकिन मन में उठे भावों को शब्द देना चाहती हूँ। मैंने बहुत लंबे समय तक सीआईडी देखा। जब इसका पुनः प्रसारण होता था, तब भी बड़े मन से देखती थी। सीरियल देखते समय मैं खुद को भी उसकी टीम का सदस्य ही समझने लगती थी। ऐसा लगता था, जैसे मैं भी केस की जाँच में शामिल हूँ और असली अपराधी को पकड़ने में टीम की मदद करूँगी। कई बार मेरी सोच सही निकलती थी और मैं सही अपराधी को पहचान लेती थी। वहीं, कई बार मेरा अनुमान बिल्कुल गलत साबित होता था और अपराधी कोई ऐसा व्यक्ति निकलता था, जिसके बारे में मैंने सोचा भी नहीं होता था। सीआईडी देखते समय मेरा दिमाग लगातार चलता रहता था। हर दृश्य में कोई सुराग तलाशने और अपराधी का अनुमान लगाने...