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इशारा काफी है

द्विशा शर्मा के नाम से आप सब परिचित हो ही होंगे। हमारे यहाँ लड़कियों के नाम कुछ भी हो, लेकिन किस्मत मिलती-जुलती ही है। अनपढ़ रहो, गृहिणी रहो, नौकरी करो, बेवकूफ रहो या स्मार्ट नतीजा एक ही। यानी या तो मार दिया जायेगा, या मरने के लिए विवश कर दिया जायेगा। दोनों ही स्थिति में परिजन बच नहीं पायेंगे। पति तो बिल्कुल भी नहीं। इसीलिए पुरुष वर्ग को अब सचेत हो ही जाना चाहिए, कि स्थिति चिंताजनक है। अगर तुम एडजस्ट नहीं कर पा रहे हो और लड़की स्मार्ट निकली तो तुम्हारे लिए पहाड़, ड्रम, सूटकेस तो है ही, उसके अलावा भी बहुत रास्ते हो सकते हैं। और अगर तुमने पत्नी को ही टाटा-बाय बाय कर दिया तो फिर तो तुम्हारे लिए जेल के दरवाजे, सोशल साइट्स और न्यूज चैनल ही तुम्हारा संसार होगा। मसलन तुम्हारे पास दो साफ-साफ रास्ते हैं, कि अगर जिंदगी चाहते हो तो समझदारी से, प्यार से, अपनी पत्नी के पास बैठिये, उसकी बातों को ध्यान से सुनिये। उसकी समस्या को सुनिये और मिल-जुल कर समाधान निकालिये। इससे आप भी सुरक्षित रहेंगे, आपका परिवार भी और सब अच्छी जिंदगी जी लेंगे। अगर परिवार में आपके बूढ़े मा-पिता हैं, तो उनका बुढ़ापा अच्छे से ब...

अर्द्धशतक

अर्द्धशतक यानी 50 साल। जी हाँ, मेरे जीवन का अर्द्धशतक चल रहा है। चल रहा है इसलिए बोल रही हूँ, कि मैं इसको कभी-कभी इंजाय करती हूँ, तो कभी कभी लगता है कि यह 50 साल बहुत कष्ट में बीता। मैं बहुत ज्यादा अच्छी जिंदगी की आस में थी, लेकिन न जाने क्यूँ मुझे वैसी जिंदगी नहीं मिल पाई, जो मैं सोची थी। यह भी बात सही है कि सोचना और पाना दोनों अलग अलग मुद्दा है। सोचने के लिए तो सभी अच्छा ही सोचते हैं, खुद के लिए। लेकिन कितना कर पाते हैं, कितना पाते हैं यह मामला ही बड़ा मामला है। मेरे ख्याल से मेरे जीवन का 50 साल बेकार ही गया है। कुछ भी अर्जित नहीं कर पाई। ना अपने अंदर, और ना ही बाहर। कभी-कभी मैं सोचती हूँ कि अगर मैं मरी तो मुझे चार लोग मिलेंगे भी नहीं। कभी यह भी सोच लेती हूँ कि क्या मुझे कोई याद भी करेगा या नहीं। फिलहाल तो मुझे यही लगता है कि मेरे जीते जी ही मेरा जीवन बेकार है, तो मैं कैसे सोचती हूँ कि मेरे मरने के बाद क्या होगा। पिछले पचास साल में मैंने एक भी काम ऐसा नहीं किया जिससे सुकून मिले। ना ही किसी लायक हो पाई, ना ही मैं किसी से बेइंतहा मोहब्बत की, न ही कोई मुझे दीवाने की तरह प्यार किया। सुबह...

हवा

मैं कोई फूल नहीं जो कोई मुझको तोड़ ले मैं कोई पत्थर नहीं जो रस्सी के आने-जाने से घिस जाऊँ मैं तो हवा हूँ अगर रुक गई तो सबका दम घुंटने लगेगा मैं तो हवा हूँ अगर रुक गई तो सबका दम घुंटने लगेगा

दो शब्द , हमारे रिश्ते को

जब मैं बलाका में शिफ्ट हुई, तब केवल परिवार के नाम पर हम दो ही थे पति-पत्नी। एक दिन जब मैं आफिस जाने के लिए निकल रही थी, तो यानी नीचे की तरफ सीढ़ी से उतर रही थी तो एक सज्जन दिखें। वे मुझे देखकर एक अच्छी सी बड़ी सी स्माइल किये, और बोले कि मेरा गैस सिलेंडर आने वाला है और मेरे पास अभी रुपये नहीं है। क्या आप मुझे 500 रुपये दे सकती हैं। मैं उनको पहचानती नहीं थी। आज के पहले देखी भी नहीं थी इसलिए मुझे कुछ अटपटा-सा लगा। मैं सोचने लगी कि क्या करूँ किसी को ना करना अच्छा नहीं लगता। लेकिन उनको जानती नहीं हू इसलिए रुपये देने में भी हिचकिचाहट हो रही थी। लेकिन उनका व्यक्तित्व इतना जबरदस्त था कि क्या बताऊँ, ऊँचा कद, हैंडसम व्यक्तित्व, उम्र 65 के पार होगी, लेकिन उम्र का कोई असर नहीं, बल्कि एक युवा के बगल में खड़ा कर दिया जाए तो भी यहीं बीस लगेंगे। बातचीत में इतने शालीन कि विनम्र होकर बोले कि आप घबराइये नहीं, मेरा फ्लैट नीचे है। मैं आपको शाम को रुपया वापस कर दूंगा। मैं बोली कि रुपये तो अभी मेरे पास नहीं है,. ठीक है घर जाकर लाकर देती हूँ। और फिर शाम को जब मैं आफिस से आई और उसके तुरंत बाद ही वह 500 रुपये ल...

ऑटो-यात्रा

र से ऑफिस और ऑफिस से घर आना-जाना भी एक यात्रा है। छोटी पर दैनिक यात्रा। घर के सारे काम जल्दी-जल्दी निपटाकर, तैयार होकर ऑफिस निकलना, जहाँ थकान भर देता है वहीं ऊर्जा भी देता है। इस दौरान कई चेहरे और कई बातें होती रहती है। कुछ तो दिल दिमाग में बस जाता है तो कई बातों पर ध्यान ही नहीं जाता। कभी कुछ अच्छा लगता है तो कुछ बातें तकलीफ पहुँचा देती है। सफर के दौरान बहुत कुछ जानने और सीखने को भी मिलता है। मैं इस दौरान की कुछ बातें आप सभी के साथ शेयर करना चाहती हूँ। बात पिछले दिनों की है। ऑफिस से घर लौटने के क्रम में मैं जब ऑटो स्टैंड के पास पहुँची तो एक लड़की दौड़ती हुई ऑटो की तरफ लपकी और झट से किनारे की सीट पर बैठ गई। वह जल्दी में लग रही थी। उसके बाद एक पुरुष (55-60 साल) बैठे और किनारे की तरफ मैं बैठ गई। सामने की तरफ एक लड़का के बैठते ही चालक ने वाहन को स्टार्ट कर दिया। वह लड़की, जिसकी उम्र 23-24 के आस-पास रही होगी। देखने से लग रहा था कि अभी-अभी पढ़ाई पूरी कर नौकरी की दुनिया में प्रवेश की है। वह मोबाइल से किसी से बात कर रही थी कि एक लड़का पिछले कई दिनों से उसका पीछा कर रहा है। इसके पहले वह जिस ऑट...

वैलेंटाइन डे

आज बचपन की कुछ बातें याद आ गई। बात यह थी कि उस समय हमारे घर में पापा ऑफिस से सीधे घर आ जाया करते थे। यानी शाम को सात बजे के करीब वह घर आ जाया करते थे। हाँ,जब वह कोलकाता से बाहर है, तो उसकी बात दूसरी। हाँ, तो मैं बोल रही थी कि शाम सात बजे से सुबह नौ बजे यानी जब उनका कार्यालय जाने का समय होता तब तक का समय हमलोग साथ में बिताते थे। उस समय पापा अपना काम, आराम, और भी बहुत कुछ किया करते थे। हमलोग पढ़ाई, घर का हल्का फुल्का काम, और खेलना जैसा बड़ा काम करते रहते थे। माँ भी अपने काम में व्यस्त रहती थी। यानी सब अपने अपने काम में व्यस्त। लेकिन सबको सबका साथ। और आसपास के चाचा-चाची,भैया-भाभी अगर शाम को घर आ गये, तो अच्छा खासा अड्डा जम जाता था। बहुत सारी बातें होती थी, पकौड़ी छनने लगता था, लूडो भी शुरू हो जाता था । घर में अपनापन, सुख का एक माहौल होता था। भरपूर बातचीत का समय मिलता था। हम सब साथ होते थे। आपस में बहुत सारी बातें होती थी। पापा के आने के बाद माँ भी रिलेक्स होती थी। उनके चेहरे पर सुकून और शांति होती थी। बच्चों के चेहरे पर खुशी और अपनेपन का माहौल होता था। सब साथ-साथ होते थे। कई बार नोंक-झोंक...

दिल की बात

जो चाहा, पाई नहीं, जो पाई वह चाही नहीं। जिसका सपना देखी, वह हकीकत बन नहीं पाया। जो हकीकत में है, उसको अपना नहीं पाई। अकेले रहना अच्छा नहीं लगता। लोगों का साथ मिलता नहीं। कोई मुझे समय देता नहीं, मेरा समय किसी को चाहिए नहीं। मैं किसी की दीवानीं नहीं, कोई मेरा चाहनेवाला नही। मैं इतनी गरीब नहीं, कि मैं गरीब का लेबल लगाकर घूमूँ। और अमीर भी इतनी नहीं कि शान, शौकत से रह सकूँ। छोटा सा प्यारा परिवार है, लेकिन बुजुर्ग की कमी है। लोगों से दूर हूँ, पर किसी से अंजान नहीं। मसलन,मसलन न जाने कितनी बातें हैं और कुछ भी बातें नहीं। बातें बहुत है पर सुनने वाला कोई नहीं। दिल की तो एकदम नहीं। काम मैं ज्यादा कर नहीं पाती,इसलिए काम से मैं दूर ही रहती हूँ। दिल की बात दिल में है। दिल के बाहर की बात भी कोई नहीं करने वाला। मेरे अकेलेपन को मैं दिन दुनी रात चौगुनी बढ़ाती रहती हूँ।