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पत्थरों के राज्य का रहस्य (कहानी) मेरे द्वारा अनुवाद किया हुआ

पत्थरों के राज्य का रहस्य बहुत समय पहले की बात है। चारों ओर हरे-भरे वन, ऊँचे-ऊँचे पर्वत और कल-कल बहती नदियों से घिरे रुपनगर नामक एक समृद्ध राज्य में एक वृद्ध राजा का शासन था। राजा न्यायप्रिय, दयालु और अपनी प्रजा के प्रति अत्यंत स्नेह रखने वाले थे। उनका एकमात्र पुत्र था—एक सुंदर, साहसी और बुद्धिमान राजकुमार। राजकुमार बचपन से ही राजकाज की बारीकियों को समझने में रुचि रखता था। वह पिता के साथ दरबार में बैठता, मंत्रियों की बातें ध्यान से सुनता और राज्य से संबंधित प्रत्येक विषय को समझने का प्रयास करता। वृद्ध राजा को अपने पुत्र पर पूरा विश्वास था। उन्हें निश्चय था कि उनके बाद राजकुमार राज्य की बागडोर कुशलतापूर्वक सँभालेगा। एक दिन राजकुमार ने अपने माता-पिता के सामने अपनी एक इच्छा प्रकट की। “पिताजी,” उसने कहा, “मैं अपने राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों की यात्रा करना चाहता हूँ। मैं स्वयं देखना चाहता हूँ कि हमारे गाँवों में लोग किस प्रकार रहते हैं और उनका जीवन कैसा है।” राजा ने आश्चर्य से अपने पुत्र की ओर देखा। “लेकिन पुत्र, तुम अकेले जाना चाहते हो? जंगलों और निर्जन मार्गों में अनेक प्रकार के संकट हो स...
मेरी माँ पांच भाई - बहनों में छोटी होने के कारन मेरा और मेरी माँ के बिच एक अलग ही तरह का प्यार था आकर्षण था , जो हमेशा ही बना रहा । जब से मैंने दुनिया को देखना सिखा , चलना सिखा अपने पास केवल अपनी माँ को ही पाया। लगता था जैसे उनके पास मुझे हर ख़ुशी मिल जाती थी । सायद इसिलिय आज तक मेरी कोई दोस्त नहीं हे । क्योंकि सायद मुझे कभी किसी की जरुरत ही महसूस नहीं हुई। हम माँ बेटी से ज्यादा एक दुसरे के दोस्त थे । लेकिन जय आज जब मेरी माँ इस दुनिया को छोढ़ चली गयी हे तो में कितनी अकेली महसूस करती हु । आज मैं दो बेटियों की माँ हूँ। एक माँ होकर माँ को अच्छी तरह समझ पा रही हूँ। मैं चाहती हूँ कि जिस तरह मेरा और मेरी माँ का रिश्ता था, उसी तरह मेरा और मेरी बेटियों का रिश्ता रहें। लेकिन वह रिश्ता मजबूत होना चाहिए, कमजोर नहीं। मेरी बडी बेटी बहुत भावुक है। बिल्कुल मेरी तरह। और उससे भी ज्यादा भावुक और दिल से सोचने वाली। थोडा 

Mannu bhandari

आज मन्नू भंडारी जी की कहानी स्त्री सुबोधिनी पढ़ी। वैसे यह कहानी पहले भी पढ़ी थी। जितनी बार पढ़ती हूँ, उतनी ही बार कुछ नया लगता है। सबसे बड़ी खास बात लगती है कि उनकी कहानी पात्रों के इर्द-गिर्द नहीं घूमती। स्पष्ट तरीके से लिखती है। यह कहानी भी वैसी ही है। नाम से ही स्पष्ट है कि ज्ञान देने वाली स्त्री। यह एक चिट्ठी है, अपनी प्यारी बहनों के नाम। आज के समय में तो चिट्ठी का नामों निशान नहीं। इसलिए यह और भी ज्यादा प्रासंगिक है। इसके माध्यम से आज की लड़कियों को चिट्ठी का ज्ञान भी होगा। और सबसे बड़ी बात है कि लड़कियाँ जो कम उम्र की होती है, शादीशुदा आदमी से प्रेम कर बैठती है। शादीशुदा इंसान उसके भोले भाले मन का बहुत अच्छे से फायदा उठाता है। वह बहुत ही साधारण भाषा में स्कूल, कालेज में पढ़ने वाली लड़कियों को बताना चाहती है कि जब वह नौकरी में आयीं, तो उनको अपने ही बॉस शिंदे से प्रेम हो गया। पुरुष अपना घर, परिवार बचाते हुए ही बाहरी प्रेम कैसे जिंदा रखते हैं। वह अपनी मीठी-मीठी बातों से कम उम्र की लड़कियों का दिल ले लेते हैं और उनकी भावनाओं के साथ खेलते रहते हैं। शिंदे उम्मीद दिलाता रहता है कि वह सा...

इशारा काफी है

द्विशा शर्मा के नाम से आप सब परिचित हो ही होंगे। हमारे यहाँ लड़कियों के नाम कुछ भी हो, लेकिन किस्मत मिलती-जुलती ही है। अनपढ़ रहो, गृहिणी रहो, नौकरी करो, बेवकूफ रहो या स्मार्ट नतीजा एक ही। यानी या तो मार दिया जायेगा, या मरने के लिए विवश कर दिया जायेगा। दोनों ही स्थिति में परिजन बच नहीं पायेंगे। पति तो बिल्कुल भी नहीं। इसीलिए पुरुष वर्ग को अब सचेत हो ही जाना चाहिए, कि स्थिति चिंताजनक है। अगर तुम एडजस्ट नहीं कर पा रहे हो और लड़की स्मार्ट निकली तो तुम्हारे लिए पहाड़, ड्रम, सूटकेस तो है ही, उसके अलावा भी बहुत रास्ते हो सकते हैं। और अगर तुमने पत्नी को ही टाटा-बाय बाय कर दिया तो फिर तो तुम्हारे लिए जेल के दरवाजे, सोशल साइट्स और न्यूज चैनल ही तुम्हारा संसार होगा। मसलन तुम्हारे पास दो साफ-साफ रास्ते हैं, कि अगर जिंदगी चाहते हो तो समझदारी से, प्यार से, अपनी पत्नी के पास बैठिये, उसकी बातों को ध्यान से सुनिये। उसकी समस्या को सुनिये और मिल-जुल कर समाधान निकालिये। इससे आप भी सुरक्षित रहेंगे, आपका परिवार भी और सब अच्छी जिंदगी जी लेंगे। अगर परिवार में आपके बूढ़े मा-पिता हैं, तो उनका बुढ़ापा अच्छे से ब...

अर्द्धशतक

अर्द्धशतक यानी 50 साल। जी हाँ, मेरे जीवन का अर्द्धशतक चल रहा है। चल रहा है इसलिए बोल रही हूँ, कि मैं इसको कभी-कभी इंजाय करती हूँ, तो कभी कभी लगता है कि यह 50 साल बहुत कष्ट में बीता। मैं बहुत ज्यादा अच्छी जिंदगी की आस में थी, लेकिन न जाने क्यूँ मुझे वैसी जिंदगी नहीं मिल पाई, जो मैं सोची थी। यह भी बात सही है कि सोचना और पाना दोनों अलग अलग मुद्दा है। सोचने के लिए तो सभी अच्छा ही सोचते हैं, खुद के लिए। लेकिन कितना कर पाते हैं, कितना पाते हैं यह मामला ही बड़ा मामला है। मेरे ख्याल से मेरे जीवन का 50 साल बेकार ही गया है। कुछ भी अर्जित नहीं कर पाई। ना अपने अंदर, और ना ही बाहर। कभी-कभी मैं सोचती हूँ कि अगर मैं मरी तो मुझे चार लोग मिलेंगे भी नहीं। कभी यह भी सोच लेती हूँ कि क्या मुझे कोई याद भी करेगा या नहीं। फिलहाल तो मुझे यही लगता है कि मेरे जीते जी ही मेरा जीवन बेकार है, तो मैं कैसे सोचती हूँ कि मेरे मरने के बाद क्या होगा। पिछले पचास साल में मैंने एक भी काम ऐसा नहीं किया जिससे सुकून मिले। ना ही किसी लायक हो पाई, ना ही मैं किसी से बेइंतहा मोहब्बत की, न ही कोई मुझे दीवाने की तरह प्यार किया। सुबह...

हवा

मैं कोई फूल नहीं जो कोई मुझको तोड़ ले मैं कोई पत्थर नहीं जो रस्सी के आने-जाने से घिस जाऊँ मैं तो हवा हूँ अगर रुक गई तो सबका दम घुंटने लगेगा मैं तो हवा हूँ अगर रुक गई तो सबका दम घुंटने लगेगा

दो शब्द , हमारे रिश्ते को

जब मैं बलाका में शिफ्ट हुई, तब केवल परिवार के नाम पर हम दो ही थे पति-पत्नी। एक दिन जब मैं आफिस जाने के लिए निकल रही थी, तो यानी नीचे की तरफ सीढ़ी से उतर रही थी तो एक सज्जन दिखें। वे मुझे देखकर एक अच्छी सी बड़ी सी स्माइल किये, और बोले कि मेरा गैस सिलेंडर आने वाला है और मेरे पास अभी रुपये नहीं है। क्या आप मुझे 500 रुपये दे सकती हैं। मैं उनको पहचानती नहीं थी। आज के पहले देखी भी नहीं थी इसलिए मुझे कुछ अटपटा-सा लगा। मैं सोचने लगी कि क्या करूँ किसी को ना करना अच्छा नहीं लगता। लेकिन उनको जानती नहीं हू इसलिए रुपये देने में भी हिचकिचाहट हो रही थी। लेकिन उनका व्यक्तित्व इतना जबरदस्त था कि क्या बताऊँ, ऊँचा कद, हैंडसम व्यक्तित्व, उम्र 65 के पार होगी, लेकिन उम्र का कोई असर नहीं, बल्कि एक युवा के बगल में खड़ा कर दिया जाए तो भी यहीं बीस लगेंगे। बातचीत में इतने शालीन कि विनम्र होकर बोले कि आप घबराइये नहीं, मेरा फ्लैट नीचे है। मैं आपको शाम को रुपया वापस कर दूंगा। मैं बोली कि रुपये तो अभी मेरे पास नहीं है,. ठीक है घर जाकर लाकर देती हूँ। और फिर शाम को जब मैं आफिस से आई और उसके तुरंत बाद ही वह 500 रुपये ल...