अर्द्धशतक
अर्द्धशतक यानी 50 साल। जी हाँ, मेरे जीवन का अर्द्धशतक चल रहा है। चल रहा है इसलिए बोल रही हूँ, कि मैं इसको कभी-कभी इंजाय करती हूँ, तो कभी कभी लगता है कि यह 50 साल बहुत कष्ट में बीता। मैं बहुत ज्यादा अच्छी जिंदगी की आस में थी, लेकिन न जाने क्यूँ मुझे वैसी जिंदगी नहीं मिल पाई, जो मैं सोची थी। यह भी बात सही है कि सोचना और पाना दोनों अलग अलग मुद्दा है। सोचने के लिए तो सभी अच्छा ही सोचते हैं, खुद के लिए। लेकिन कितना कर पाते हैं, कितना पाते हैं यह मामला ही बड़ा मामला है। मेरे ख्याल से मेरे जीवन का 50 साल बेकार ही गया है। कुछ भी अर्जित नहीं कर पाई। ना अपने अंदर, और ना ही बाहर। कभी-कभी मैं सोचती हूँ कि अगर मैं मरी तो मुझे चार लोग मिलेंगे भी नहीं। कभी यह भी सोच लेती हूँ कि क्या मुझे कोई याद भी करेगा या नहीं। फिलहाल तो मुझे यही लगता है कि मेरे जीते जी ही मेरा जीवन बेकार है, तो मैं कैसे सोचती हूँ कि मेरे मरने के बाद क्या होगा। पिछले पचास साल में मैंने एक भी काम ऐसा नहीं किया जिससे सुकून मिले। ना ही किसी लायक हो पाई, ना ही मैं किसी से बेइंतहा मोहब्बत की, न ही कोई मुझे दीवाने की तरह प्यार किया। सुबह खाना बनाना, दिन में आफिस और शाम को फिर घर जाकर खाना और टीवी के अलावा मेरी जिंदगी में है ही क्या। जब नवंबर का महीना आया था, तो मैं बहुत खुश थी कि वाह, मैं अपने जीवन के 50 साल का सफर कर रही हूँ। मन में उत्साह भी था। लेकिन अब लग रहा है कि 50 साल कामयाबी के नहीं,खुशी के नहीं, बल्कि बोझ और तकलीफ के बीते हैं। सबसे बड़ी बात है कि मैं खुश नहीं रह पाई। मेरे लिए क्या अच्छा है, क्या बुरा है। यह भी नहीं समझ पाई। उसके लिए स्टैंड भी नहीं ले सकी। जीवन में क्या करना है, किस क्षेत्र में काम करना है, कितना कमाना है, किससे शादी करनी है, घर कैसा होना चाहिए इत्यादि...इत्यादि....कुछ भी नहीं कर पाई। एक भी फैसला नहीं की। जिसने जो रास्ता पकड़ा दिया, उस पर चल पड़ी। वह मेरे दिल और मन के लिए कितना सुकून भरा है। कितना अच्छा है, कितना बुरा है। कुछ भी नहीं सोची। बस जो सामने आया, उसी तरफ बढ़ गई। पसंद -नापसंद की कोई लिस्ट नहीं थी। आज भी नहीं है।
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