पुरुष समाज की दोहरी मानसिकता और स्त्रियों की सुरक्षा
हमारे समाज में पुरुषों का एक ऐसा वर्ग है, जो स्वयं चाहे जिस तरह का जीवन जीता हो, लेकिन दूसरों को सुधारने का ठेका जरूर ले लेता है। कुछ पुरुष खुद नशे की लत में डूबे रहते हैं, लेकिन समाज में सुधार की बातें करते हैं। वे स्वयं लड़कियों से दोस्ती करते हैं, उनके साथ घूमते हैं, उन्हें चॉकलेट खिलाते हैं और प्रेम के नाम पर अपनी इच्छाएँ पूरी करते हैं। लेकिन जब उनके अपने परिवार की लड़कियाँ किसी लड़के से दोस्ती करती हैं, तो उनके लिए यही बात इज्जत और संस्कारों का प्रश्न बन जाती है।
यह हमारे समाज की दोहरी मानसिकता का एक उदाहरण है। ऐसे पुरुषों की संख्या कम नहीं है। हालाँकि, यह भी सच है कि पूरा पुरुष समाज ऐसा नहीं है। समाज में ऐसे पुरुष भी हैं, जो महिलाओं का सम्मान करते हैं, उनकी स्वतंत्रता को समझते हैं और उनके अधिकारों के पक्ष में खड़े होते हैं। फिर भी, कुछ लोगों की गलत मानसिकता का प्रभाव इतना व्यापक है कि उसका खामियाजा पूरे समाज को भुगतना पड़ता है।
कहते हैं न कि एक मछली पूरे तालाब को गंदा कर देती है। कुछ पुरुषों की दूषित मानसिकता भी कुछ ऐसा ही करती है। जो महिलाएँ और लड़कियाँ अपनी शिक्षा, प्रतिभा और मेहनत के बल पर आगे बढ़ना चाहती हैं, उन्हें भी ऐसे लोगों की वजह से असुरक्षा का सामना करना पड़ता है। दुखद बात यह है कि लड़कियों को केवल उनकी उम्र के कारण ही नहीं, बल्कि कई बार उनके पहनावे, उनके बाहर निकलने या उनकी स्वतंत्रता के कारण भी गलत नजरों और अनुचित व्यवहार का सामना करना पड़ता है।
हमारे समाज में स्त्री और पुरुष दोनों हैं। दोनों को समान अधिकारों के साथ जीने का हक है। फिर ऐसा क्यों है कि स्त्रियों को अपने ही शहर और अपने ही देश में सुरक्षित रहने के लिए संघर्ष करना पड़ता है? यह प्रश्न हमें भीतर तक झकझोरता है।
जब पुरुषों की हवस और विकृत मानसिकता के कारण छोटी-छोटी बच्चियों से लेकर पढ़ी-लिखी युवतियों तक की सुरक्षा खतरे में पड़ जाती है, तब सभ्य समाज होने का हमारा दावा खोखला नजर आने लगता है। आखिर एक बच्ची का बचपन और एक महिला की स्वतंत्रता किसी दूसरे व्यक्ति की गलत नीयत की भेंट क्यों चढ़े?
यदि पिछले पचास वर्षों की तुलना आज के समय से करें, तो महिलाओं की शिक्षा, रोजगार और सामाजिक भागीदारी में बहुत बदलाव आया है। लड़कियाँ पहले की तुलना में अधिक संख्या में स्कूल-कॉलेज जा रही हैं, नौकरी कर रही हैं और अपने घर से दूर दूसरे शहरों में रहकर अपने सपने पूरे कर रही हैं। यह निश्चित रूप से एक सकारात्मक बदलाव है।
लेकिन एक सवाल आज भी बना हुआ है—क्या उनकी सुरक्षा को लेकर समाज की चिंता कम हुई है?
पहले भी जब लड़कियाँ घर से बाहर निकलती थीं, तो परिवार के लोग चिंतित रहते थे। आज भी अनेक परिवारों में यही स्थिति है। महानगर हों या छोटे शहर, देर शाम तक घर न पहुँचने पर फोन आने लगते हैं। लड़कियाँ पढ़ाई या नौकरी के लिए दूसरे शहरों में रहती हैं, तो उनके परिवारों की चिंता और बढ़ जाती है। शाम होते ही कई लड़कियाँ घर या हॉस्टल पहुँचने की जल्दी में रहने लगती हैं। कहीं रास्ते में कोई परेशानी न हो जाए, कहीं किसी की गलत नजर या गलत हरकत का सामना न करना पड़े—ये आशंकाएँ उनकी स्वतंत्रता के साथ चलती रहती हैं।
यहाँ यह कहना उचित होगा कि सभी पुरुष ऐसे नहीं हैं। अधिकांश पुरुष सामान्य और सम्मानजनक व्यवहार करते हैं, और बहुत से पुरुष महिलाओं की सुरक्षा तथा समानता के लिए सक्रिय रूप से प्रयास भी करते हैं। लेकिन समस्या यह है कि कुछ लोगों के व्यवहार का डर इतना गहरा है कि महिलाओं को अनजान पुरुषों पर ही नहीं, कभी-कभी परिचित लोगों पर भी भरोसा करने से पहले सोचना पड़ता है।
ऐसी स्थिति में सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि बदलाव की शुरुआत कहाँ से हो?
सबसे पहले, पुरुषों को यह समझना होगा कि स्त्री कोई उपभोग की वस्तु नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र इंसान है। उसका अपना व्यक्तित्व, अपनी इच्छाएँ, अपने सपने और अपनी पसंद-नापसंद हैं। किसी महिला के प्रति आकर्षण होने का अर्थ यह नहीं है कि उस पर किसी प्रकार का अधिकार मिल गया। प्रेम और दोस्ती तभी सार्थक हैं, जब उनमें दूसरे व्यक्ति की इच्छा, सहमति और सम्मान को महत्व दिया जाए।
दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि जो स्वतंत्रता पुरुष अपने लिए चाहते हैं, वही स्वतंत्रता उन्हें अपने परिवार की महिलाओं को भी देनी चाहिए। यदि किसी पुरुष को लड़कियों से दोस्ती करने, बाहर घूमने और अपनी पसंद से जीवन जीने का अधिकार है, तो उसकी बहन, बेटी या पत्नी को भी अपनी पसंद से जीवन जीने का अधिकार होना चाहिए। सम्मान और स्वतंत्रता के नियम केवल महिलाओं के लिए अलग नहीं हो सकते।
इस बदलाव की शुरुआत घर से ही होनी चाहिए। बेटों को बचपन से सिखाया जाना चाहिए कि महिलाओं का सम्मान करना केवल एक अच्छी आदत नहीं, बल्कि उनकी जिम्मेदारी है। उन्हें यह भी समझाना होगा कि किसी लड़की का पहनावा, उसकी दोस्ती या उसका घर से बाहर निकलना किसी को भी उसके साथ अनुचित व्यवहार करने का अधिकार नहीं देता।
इसके साथ ही स्कूलों में भी ऐसी शिक्षा की व्यवस्था होनी चाहिए, जिसमें बच्चों को लैंगिक समानता, व्यक्तिगत सीमाओं, सहमति और दूसरों के प्रति सम्मान का महत्व समझाया जाए। केवल लड़कियों को अपनी सुरक्षा के उपाय बताना पर्याप्त नहीं है; लड़कों को भी यह सिखाना आवश्यक है कि वे दूसरों की सुरक्षा, गरिमा और स्वतंत्रता का सम्मान करें।
आखिरकार, किसी सभ्य समाज की पहचान इस बात से नहीं होती कि वहाँ की लड़कियों को कितनी सावधानियाँ बरतनी पड़ती हैं, बल्कि इस बात से होती है कि वे बिना डर के कितना स्वतंत्र जीवन जी सकती हैं।
स्त्रियों को सुरक्षित रहने के लिए अपनी स्वतंत्रता सीमित करने की आवश्यकता न पड़े, बल्कि पुरुष अपनी सोच और व्यवहार को इतना बेहतर बनाएँ कि स्त्रियाँ बिना भय के अपने सपनों को पूरा कर सकें—यही एक स्वस्थ और सभ्य समाज की पहचान है।
Comments
Post a Comment