पत्थरों के राज्य का रहस्य (कहानी) मेरे द्वारा अनुवाद किया हुआ

पत्थरों के राज्य का रहस्य बहुत समय पहले की बात है। चारों ओर हरे-भरे वन, ऊँचे-ऊँचे पर्वत और कल-कल बहती नदियों से घिरे रुपनगर नामक एक समृद्ध राज्य में एक वृद्ध राजा का शासन था। राजा न्यायप्रिय, दयालु और अपनी प्रजा के प्रति अत्यंत स्नेह रखने वाले थे। उनका एकमात्र पुत्र था—एक सुंदर, साहसी और बुद्धिमान राजकुमार। राजकुमार बचपन से ही राजकाज की बारीकियों को समझने में रुचि रखता था। वह पिता के साथ दरबार में बैठता, मंत्रियों की बातें ध्यान से सुनता और राज्य से संबंधित प्रत्येक विषय को समझने का प्रयास करता। वृद्ध राजा को अपने पुत्र पर पूरा विश्वास था। उन्हें निश्चय था कि उनके बाद राजकुमार राज्य की बागडोर कुशलतापूर्वक सँभालेगा। एक दिन राजकुमार ने अपने माता-पिता के सामने अपनी एक इच्छा प्रकट की। “पिताजी,” उसने कहा, “मैं अपने राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों की यात्रा करना चाहता हूँ। मैं स्वयं देखना चाहता हूँ कि हमारे गाँवों में लोग किस प्रकार रहते हैं और उनका जीवन कैसा है।” राजा ने आश्चर्य से अपने पुत्र की ओर देखा। “लेकिन पुत्र, तुम अकेले जाना चाहते हो? जंगलों और निर्जन मार्गों में अनेक प्रकार के संकट हो सकते हैं। अकेले यात्रा करना सुरक्षित नहीं है।” रानी ने भी अपने पुत्र को समझाया, “बेटा, यदि तुम्हें यात्रा करने की इतनी ही इच्छा है, तो सैनिकों का एक दल तुम्हारे साथ जाएगा। तुम अकेले मत जाओ।” परंतु राजकुमार अपने निर्णय पर अडिग था। माता-पिता की बहुत समझाइश के बाद भी उसने अपना विचार नहीं बदला। रानी ने उसे रोकने के लिए अनेक बहुमूल्य उपहार दिए और महल में ही रहने के लिए कहा, किंतु राजकुमार का मन यात्रा के लिए व्याकुल था। अंततः उसने अस्तबल से अपना सबसे तेज़ और सुंदर घोड़ा चुना। अपने साथ नए अस्त्र-शस्त्र लिए और माता-पिता को प्रणाम करके यात्रा पर निकल पड़ा। वह कई दिनों तक यात्रा करता रहा। कभी पहाड़ों को पार करता, कभी गहरी घाटियों से गुजरता, कभी नदियों की धाराएँ पार करता और कभी विस्तृत मैदानों को पीछे छोड़ता। अंततः वह एक ऐसे घने जंगल में जा पहुँचा, जहाँ सूर्य का प्रकाश भी वृक्षों की घनी शाखाओं को भेदकर धरती तक मुश्किल से पहुँच पाता था। राजकुमार जंगल से बाहर निकलने का मार्ग खोजने लगा, लेकिन उसे कोई रास्ता दिखाई नहीं दिया। वह कभी इस ओर जाता, कभी उस ओर, परंतु हर बार उसे वही पेड़ और वही पगडंडियाँ दिखाई देतीं। धीरे-धीरे वह थक गया और अत्यंत चिंतित हो उठा। तभी अचानक उसकी दृष्टि कुछ दूर स्थित एक ऊँची इमारत पर पड़ी। इमारत को देखते ही उसके भीतर आशा की एक नई किरण जाग उठी। “शायद वहाँ से मुझे बाहर निकलने का कोई रास्ता मिल जाए,” उसने मन ही मन सोचा। वह अपने घोड़े को लेकर तेजी से उस इमारत की ओर बढ़ा। कुछ दूर जाने पर उसे एक बहुत बड़ा और भव्य फाटक दिखाई दिया। उसने फाटक के भीतर प्रवेश किया तो सामने एक पूरा राज्य बसा हुआ था। लेकिन उस राज्य में कुछ विचित्र था। चारों ओर असाधारण सन्नाटा पसरा हुआ था। राजकुमार धीरे-धीरे आगे बढ़ता हुआ राज्य के एक नगर में पहुँचा। वहाँ छोटी-बड़ी अनेक इमारतें थीं, सुंदर घर थे और चौड़ी सड़कें थीं, किंतु कहीं कोई मनुष्य दिखाई नहीं दे रहा था। न चिड़ियों के चहचहाने की आवाज़ थी, न बच्चों की हँसी सुनाई दे रही थी। न महिलाओं की बातचीत थी और न खेत-खलिहानों में काम करने वाले किसानों की आवाज़। राजकुमार के हृदय में भय उत्पन्न होने लगा। वह सावधानी से आगे बढ़ता गया। तभी उसे एक घर का दरवाज़ा आधा खुला हुआ दिखाई दिया। उसने दरवाज़े के भीतर झाँका। अंदर कई पुरुष एक साथ खड़े थे। राजकुमार ने उन्हें ध्यान से देखा। वे सभी एक ही अवस्था में खड़े थे। कोई हिल नहीं रहा था, कोई बोल नहीं रहा था। वह धीरे-धीरे उनके पास पहुँचा और उनमें से एक को छुआ। उसका हाथ ठंडे पत्थर से टकराया। राजकुमार चौंक उठा। उसने ध्यान से देखा तो उसके आश्चर्य की सीमा न रही—वे सभी मनुष्य पत्थर की मूर्तियों में बदल चुके थे! वह घबराकर वहाँ से बाहर निकला। दूसरी ओर गया तो दृश्य और भी विचित्र था। वहाँ पशु-पक्षी, पेड़-पौधे और लोग—सब पत्थर के बने हुए थे। ऐसा प्रतीत होता था मानो किसी अदृश्य शक्ति ने पूरे राज्य के जीवन को एक ही क्षण में रोक दिया हो। फिर भी वह राज्य अत्यंत समृद्ध दिखाई देता था। बड़े-बड़े भवनों के भीतर सोने के सिक्कों के ढेर लगे थे। कमरों में बहुमूल्य आभूषण, हीरे, मोती और जवाहरात भरे पड़े थे। लेकिन राजकुमार का ध्यान उस धन-दौलत की ओर नहीं गया। उसके मन में केवल एक प्रश्न था— “आखिर इस राज्य के साथ ऐसा क्या हुआ है?” रहस्य का उत्तर खोजते हुए वह आगे बढ़ा और अंततः राजमहल में जा पहुँचा। महल के भीतर एक विशाल दरबार लगा हुआ था। सिंहासन पर राजा बैठे थे और उनके चारों ओर मंत्री तथा दरबारी खड़े थे। किंतु वहाँ भी वही भयावह दृश्य था। राजा, मंत्री और सभी दरबारी पत्थर की मूर्तियाँ बने हुए थे। राजकुमार भयभीत हो उठा। उसे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। तभी अचानक उसे एक अद्भुत सुगंध महसूस हुई। वह सुगंध इतनी मनमोहक थी कि उसके कदम अनायास ही उस दिशा में बढ़ने लगे। उसमें कमल और गुलाब के फूलों की मिली-जुली सुगंध थी। राजकुमार एक कक्ष के सामने पहुँचा। उसने धीरे से दरवाज़ा खोला। कमरे के मध्य एक विशाल कमल का फूल खिला हुआ था। उसकी पंखुड़ियों के बीच एक अत्यंत सुंदर युवती सो रही थी। उसके मुखमंडल पर ऐसी अद्भुत आभा थी, मानो पूर्णिमा का चाँद कमल की पंखुड़ियों के बीच उतर आया हो। राजकुमार उसे देखता ही रह गया। पहली ही दृष्टि में उसका हृदय उस युवती के प्रति आकर्षित हो उठा। उसे उससे प्रेम हो गया। वह युवती के पास बैठ गया और उसके जागने की प्रतीक्षा करने लगा। एक दिन बीता। फिर दूसरा। फिर तीसरा। समय बीतता गया, लेकिन युवती की नींद नहीं टूटी। राजकुमार के बाल और दाढ़ी बढ़ते गए। उसका शरीर भूख-प्यास से दुर्बल होने लगा, फिर भी वह वहाँ से नहीं उठा। वह बार-बार युवती को पुकारता— “जागो... कृपया जागो...” कभी वह धीरे से उसका हाथ हिलाता, कभी उसका नाम लेकर पुकारता, लेकिन युवती गहरी नींद में सोई रहती। एक दिन अचानक राजकुमार की दृष्टि युवती के सिर के पास रखी एक छोटी-सी सोने की छड़ी पर पड़ी। फिर उसकी नज़र युवती के पैरों के पास रखी एक छोटी-सी चाँदी की छड़ी पर गई। राजकुमार ने दोनों छड़ियाँ उठा लीं और कुछ देर उनसे खेलने लगा। थोड़ी देर बाद उसने उन्हें वापस रखने का निश्चय किया। लेकिन अनजाने में उससे एक भूल हो गई। उसने चाँदी की छड़ी युवती के सिर के पास और सोने की छड़ी उसके पैरों के पास रख दी। जैसे ही उसने ऐसा किया, अचानक पूरे राज्य में हलचल मच गई। महल की दीवारें जैसे काँप उठीं। सोई हुई युवती के होंठों पर मुस्कान आ गई और उसने धीरे-धीरे अपनी आँखें खोल दीं। उसी क्षण बाहर से चिड़ियों के चहचहाने की आवाज़ आने लगी। घोड़े हिनहिनाने लगे। पेड़ों की शाखाएँ हवा में झूम उठीं। पत्थर बने मनुष्य फिर से जीवित हो उठे और पूरे राज्य में लोगों की बातचीत सुनाई देने लगी। कुछ ही क्षणों में वहाँ का सन्नाटा हर्ष और उल्लास में बदल गया। राज्य के राजा भी जीवित होकर अपने सिंहासन से उठ खड़े हुए। उन्होंने सामने खड़े राजकुमार को आश्चर्य से देखा और पूछा— “वीर युवक, तुम कौन हो? और हमारे राज्य में कैसे आए?” राजकुमार ने उन्हें अपनी पूरी कहानी सुनाई। उसने बताया कि कैसे वह अपने राज्य से अकेले निकला था, कैसे जंगल में रास्ता भटक गया और कैसे इस रहस्यमय राज्य में पहुँचा। उसने बताया कि यहाँ उसने सभी मनुष्यों और जीव-जंतुओं को पत्थर का बना हुआ देखा और किस प्रकार वह उस युवती के जागने की प्रतीक्षा करता रहा। अंत में उसने दोनों छड़ियों की पूरी घटना भी राजा को बता दी। राजा की आँखों में प्रसन्नता के आँसू छलक उठे। उन्होंने भावुक होकर कहा— “ओह, राजकुमार! अब मैं समझ गया। वर्षों पहले एक दुष्ट राक्षस ने हमारे राज्य पर श्राप डाल दिया था। उसने हम सभी को पत्थर का बना दिया था। जाते समय उसने कहा था कि एक दिन कोई महान और साहसी व्यक्ति आएगा और हमें इस श्राप से मुक्त करेगा। आज तुमने वह भविष्यवाणी सत्य कर दी।” राजा ने राजकुमार का हाथ पकड़कर कहा— “हम तुम्हारे इस उपकार का ऋण कभी नहीं चुका सकते। बताओ, मैं तुम्हें क्या उपहार दूँ?” राजकुमार कुछ क्षण मौन रहा। फिर उसने विनम्र स्वर में कहा— “महाराज, मुझे धन, सोना या जवाहरात में से कुछ भी नहीं चाहिए। यदि आप मुझे कुछ देना ही चाहते हैं, तो इस सुंदर युवती से मेरा विवाह करा दीजिए।” राजा यह सुनकर प्रसन्न हो उठे और तुरंत विवाह के लिए सहमत हो गए। कुछ ही दिनों बाद राजकुमार और उस युवती का विवाह अत्यंत धूमधाम और भव्यता के साथ संपन्न हुआ। पूरा राज्य उत्सव में डूब गया। विवाह के बाद राजकुमार अपनी पत्नी के साथ अपने राज्य रुपनगर की ओर चल पड़ा। उधर रुपनगर में वृद्ध राजा अपने पुत्र के वियोग में अत्यंत दुखी हो चुके थे। निरंतर चिंता के कारण उनका स्वास्थ्य बिगड़ गया था और उनकी दृष्टि भी कमजोर हो गई थी। रानी भी अपने पुत्र की प्रतीक्षा करते-करते बीमार पड़ चुकी थीं। लेकिन एक दिन महल के द्वार पर घोड़ों की टापें सुनाई दीं। राजकुमार लौट आया था। अपने पुत्र को सकुशल देखकर वृद्ध राजा और रानी की आँखों से खुशी के आँसू बह निकले। उन्होंने राजकुमार और उसकी पत्नी को हृदय से लगा लिया। राजकुमार के लौटने से महल में फिर से खुशियाँ लौट आईं। कुछ समय बाद वृद्ध राजा ने अपने पुत्र को राज्य की बागडोर सौंप दी। राजकुमार राजा बना और उसने बड़ी बुद्धिमत्ता, न्याय तथा दया के साथ शासन करना आरंभ किया। उसके शासन में रुपनगर दिन-प्रतिदिन समृद्ध और खुशहाल होता गया। इस प्रकार एक साहसी राजकुमार की यात्रा ने न केवल उसे अपने जीवन का प्रेम दिया, बल्कि एक पूरे राज्य को वर्षों पुराने श्राप से भी मुक्त कर दिया। शिक्षा सच्चा साहस, धैर्य और निस्वार्थ प्रेम मनुष्य को कठिन से कठिन परिस्थितियों पर विजय पाने की शक्ति प्रदान करते हैं।

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