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हाँ, मैंने प्रेम किया है

हाँ, मैंने प्रेम किया है बहुत ज्यादा प्रेम किया है प्रेम में डूब गयी हूँ प्रेममय हो गयी हूँ हाँ, मैंने प्रेम किया है प्रेम के गीत गुनगुनाती हूँ जीवन भर साथ देने का वादा किया है खुशी और गम में भी साथ रहने का इरादा है हाँ, मैंने प्रेम किया है प्रेम में पागल हो चुकी हूँ कुछ और दिखता नहीं केवल प्रेम ही प्रेम दिखता है मैं मीरा बन चुकी हूँ, मैं राधा बन चुकी हूँ डूबा हुआ है मेरा मन हाँ, मैंने बहुत प्रेम कर लिया है इतना कि अब तो सबको इसकी भनक भी मिलने लगी होगी जलने वाले जलने भी लगे होंगे हाँ, मैंने प्रेम कर लिया है तुमने बिल्कुल सही सुना है सही समझा है मैंने प्रेम किया है मेरे धड़कन में भी मेरे दिल में भी मेरे ख्वाब में भी मैं प्रेम करने लगी हूँ जी हाँ, मैंने खुद से प्रेम कर लिया है अपने आप से प्रेम कर लिया है इतना प्रेम किया है कि आँखें, दिल मेरे ही प्रेम में गोते खा रहा है हाँ, मैंने खुद से प्रेम कर लिया है कोई खता तो नहीं की ना ही कोई भूल मैंने तो केवल खुद से प्यार किया है और सबसे बड़ी बात है कि इसको स्वीकार...

जिंदगी की रानी बनी रानी मुखर्जी ‘हिचकी’ में

हिचकी। जी हाँ, हिचकी। घबराइये नहीं। वो हिचकी नहीं, जिससे पता चले कि आपको कोई याद कर रहा है या फिर वो भी हिचकी नहीं जिससे कि लोग आपके सामने पानी बढ़ा दे। यह हिचकी रानी मुखर्जी की ‘हिचकी’ है। यानी बालीवुड की एक नयी फिल्म। एक नयी सोच पर बनी फिल्म। इस फिल्म में ‘हिचकी’ को एक बीमारी के रूप में दिखाया गया है, जिसकी वजह से रानी मुखर्जी (नैना) एक सामान्य जिंदगी नहीं जी पाती है और उसे हर जगह अलग तरह से देखा जाता है। पर उसने बड़ी सच्चाई से अपनी इस कमजोरी को ही ताकत बना लिया और एक सफलतम जिंदगी जी कर दिखा दिया। इस फिल्म के माध्यम से हम यह जरूर समझ सकते हैं कि जिस तरह रानी मुखर्जी (नैना) को हिचकी की परेशानी थी, उसी तरह से हम सब के अंदर कोई न कोई कमी और परेशानी जरूर है, और जब हम अपनी कमी और परेशानी को स्वीकार कर उसके साथ आगे बढ़ने का हौसला रखते हैं, तो दुनिया की कोई ताकत रोक नहीं सकती। बालीवुड में अपनी अमिट छाप रखने वाली अभिनेत्री रानी मुखर्जी चार साल के अंतराल के बाद इस फिल्म से बालीवुड में फिर से आई हैं। उनके दर्शक इस रोल में भी काफी पसंद किया है। इस फिल्म में रानी मुखर्जी एक सामान्य परिवार की ए...

चुप

चुप चुप रहना कितना मुश्किल होता है यह जानती है केवल  एक लड़की जो बचपन से ही हंसना, मुस्कुराना खिलखिलाना  चाहती  है पर न जाने क्यों किसी को रास नहीं आता  लड़कियों का हंसना मुस्कुराना, और खिलखिलाना विवश कर दिया है उसे केवल चुप रहने के लिए चुप होती है वह उसके होठों से शब्द नहीं निकलते पर उसके अंदर ज्वार-भाटा आता-जाता रहता है उसके अंदर सिमटा रहता है ज्वालामुखी का लावा कभी भी किसी भी पल फूटने के लिए बेताब रहता है पर इन सब को दबाकर अपने आपको घोंटकर लड़कियों ने सीख लिया है चुप रहना इसलिए नहीं कि वह चुप होकर खुश है इसलिए भी नहीं कि वह चुप होकर शांति महसूस करती है बल्कि इसलिए कि लोगों की की चाहत के लिए उसने अपनी जुबान अपनी भावनाओं पर चुप्पी का ताला लगा लिया है चुप रहने के बावजूद वह जिंदा है उसके अंदर संवेदना,  प्यार  जिंदा है और सब कुछ को जिंदा रखे हुए उसने ओढ लिया है कफन चुप रहने का।
माँ को गये, दस साल हो गये। बहुत लंबा समय हो गया। कभी सोची भी नहीं थी कि माँ के बिना जी भी पाऊँगी। पर जी रही हूँ। पर मैं यह कह सकती हूँ कि इन दस वर्षों में ऐसा कोई दिन नहीं बीता होगा, जब माँ शब्द मेरे मुँह से नहीं निकला होगा। माँ खुशी में भी , दुख में भी सबसे पहले पास होती है। वो महसूस होती है। मुझे याद है बड़े भैया हमेशा कहा करते थे कि माँ का आंचल पकड़ कर रखोगी तो कभी आगे नहीं बढ़ पाओगी। सही कहा करते थे, मैं आगे नहीं बढ़ पाई। पर माँ का आँचल कभी नहीं छोड़ पाई। पर बाद के दिनों में मैं देखा करती थी कि माँ का आँचल सबसे ज्यादा बड़े भैया ही  पकड़े थे। जब माँ बहुत बीमार थी। तब कईयों बार देखी कि सुबह में माँ के पाँव के पास बड़े भैया सो रहे थे। रात में वो अपने कमरे में सोते थे, पर आधी रात में सबके सो जाने के बाद वह माँ के पास आ जाते थे, और चुपचाप वह माँ के पाँव सो जाया करते थे। माँ के साथ मेरा एक अलग प्रेम था। उनको देख लेने से, उनके पास होने से, उनके स्पर्श से इतनी अच्छी नींद आती थी, जो शायद मैं इन दस सालों में नहीं पाई। मुझे याद है कि केवल वो मेरे पास रहती थी, तो लगता था कि मैं पूरी हूँ। और अगर ...
लोग मुझे कहते हैं मूर्ख कुछ लोग सामने तो कुछ लोग पीठ पीछे क्यों कहते हैं क्या इसलिए कि मैं लोगों से अलग-थलग रहती हूँ या इसलिए कि मैं चुपचाप सबको सुनती हूँ महसूस करती हूँ कुछ भी नहीं कहती हूँ या फिर इसलिए कि मैं शांत रहकर अपना काम केवल  अपना काम करना चाहती हूँ छल-कपट झूठ-फरेब से दूर रहती हूँ या फिर इसलिए़ क्योंकि मैं हाय-हैलो नहीं करती या फिर इसलिए कि मैं चापलूसी नहीं करती जी-हुजूरी नहीं करती लोगों से ज्यादा मिक्स नहीं होती अलग-थलग रहती हूँ या फिर इसलिए कि यहाँ सभी एक-दूसरे को मूर्ख ही कहते हैं चाहे कोई भी हो कैसा भी हो सबके लिए एक ही नाम है ऊँची कुर्सी पर बैठने वालों  को ही कोई छोड़ता नहीं तो कोई मुझे कैसे छोड़ेगा सब एक-दूसरे के लिए यहाँ मूर्ख है और एक-दूसरे को मूर्ख बताकर अपने को आगे बढ़ने की मूर्खता हर कोई कर रहा है पर सब एक दूसरे से छुप कर एक दूसरे के पीठ पीछे एक-दूसरे को मूर्ख बता रहा है

रेखा जैसी बनने की चाह

रेखा। फिल्म अभिनेत्री रेखा। सिर्फ नाम ही काफी है। नाम लेते ही खुबसूरत चेहरा आँखों के सामने आ जाता है। वो रेखा जहाँ किस्मत से कुछ भी नहीं मिला। सब मिला अपनी मेहनत और लगन से। अपने अविवाहित माँ-पिता की संतान होने के दर्द के साथ ही 10 अक्टूबर 19     को जन्म हुआ। माँ –पिता दोनों ही फिल्मी दुनिया के थे, पर उससे ज्यादा आगे बढ़ने का ख्वाब लेकर चलने वालीं रेखा ने 1966 में हिंदी फिल्म में कदम रखा। सावन भादो फिल्म से। जहाँ एक मोटी, बदसूरत लड़की दिखी। अगर वही रूप-रंग रह जाता तो वो रेखा रेखा नहीं बन पातीं। लेकिन इस बात को उन्होंने न केवल समझा, महसूस किया बल्कि कारगर साबित किया। योगा और खानपान से जहाँ खुद को इतना खूबसूरत बना लीं, वहीं मेकअप कर ऐसा जादू दिखाया जो आज तक बरकरार है। जहाँ भी अगर किसी समारोह में पहुँचतीं हैं तो साड़ी में खूबसूरत सा चेहरा दमकता रहता है। कम उम्र की हीरोइनों में भी इतनी चमक नहीं जितनी 63 उम्र में रेखा के चेहरे पर। और वो भी ऐसा चेहरा जो उन्हें जन्म से नहीं मिला, बल्कि कर्म से मिला। यह इंडस्ट्री किसी भी लड़की को लड़के और प्रेम से बिना जोड़े रह ही नहीं सकता, तो र...

sulu

वर्ष 2017 जाने को तैयार है और 2018 आने के लिए बेताब है। शुक्र है कि इस साल कुछ अच्छी फिल्में देखने को मिली। वैसे बॉलीवुड की  अधिकतर फिल्में हमेशा दर्शकों को भ्रमित ही करती रही है। कभी जब संयुक्त परिवार का चलन था, तो बालीवुड की फिल्मों में भाभी-ननद, सास-बहू, भाई-भाई की लड़ाई को ही ज्यादा दिखाता है। एक समय विलेन को तो हीरो के बराबर ही माना जाता था। इसके अलावा बालीवुड की फिल्म में एक ऐसी चीज भरी रहती है, जिसे देखकर युवा वर्ग पूरी तरह से  भ्रमित हो जाते हैं। तीन घंटे की फिल्म खत्म होने के बाद भी युवा मन खोया-खोया सा  रह जाता है । जी हाँ, आपने बिल्कुल ठीक ही समझा। बालीवुड की फिल्मों में प्यार, रोमांस की भरमार होती है। फिल्मों में प्यार, रोमांस देखकर नवयुवक भ्रमित हो जाते हैं। वे अपनी जिंदगी में भी वैसा ही प्यार खोजने लगते हैं और उन्हें हाथ लगता है केवल निराशा। क्योंकि जिंदगी में फिल्मों जैसा प्यार तो हो ही नहीं सकता। पर अब लगता है इन बातों को बॉलीवुड ने भी महसूस किया और इससे अलग हटकर फिल्में बनने लगी है। वर्ष 2017 में कई ऐसी फिल्में आयीं, जिससे देखकर मन खुश हुआ। और कुछ ऐसी आन...