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पत्थरों के राज्य का रहस्य (कहानी) मेरे द्वारा अनुवाद किया हुआ

पत्थरों के राज्य का रहस्य बहुत समय पहले की बात है। चारों ओर हरे-भरे वन, ऊँचे-ऊँचे पर्वत और कल-कल बहती नदियों से घिरे रुपनगर नामक एक समृद्ध राज्य में एक वृद्ध राजा का शासन था। राजा न्यायप्रिय, दयालु और अपनी प्रजा के प्रति अत्यंत स्नेह रखने वाले थे। उनका एकमात्र पुत्र था—एक सुंदर, साहसी और बुद्धिमान राजकुमार। राजकुमार बचपन से ही राजकाज की बारीकियों को समझने में रुचि रखता था। वह पिता के साथ दरबार में बैठता, मंत्रियों की बातें ध्यान से सुनता और राज्य से संबंधित प्रत्येक विषय को समझने का प्रयास करता। वृद्ध राजा को अपने पुत्र पर पूरा विश्वास था। उन्हें निश्चय था कि उनके बाद राजकुमार राज्य की बागडोर कुशलतापूर्वक सँभालेगा। एक दिन राजकुमार ने अपने माता-पिता के सामने अपनी एक इच्छा प्रकट की। “पिताजी,” उसने कहा, “मैं अपने राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों की यात्रा करना चाहता हूँ। मैं स्वयं देखना चाहता हूँ कि हमारे गाँवों में लोग किस प्रकार रहते हैं और उनका जीवन कैसा है।” राजा ने आश्चर्य से अपने पुत्र की ओर देखा। “लेकिन पुत्र, तुम अकेले जाना चाहते हो? जंगलों और निर्जन मार्गों में अनेक प्रकार के संकट हो स...
मेरी माँ पांच भाई - बहनों में छोटी होने के कारन मेरा और मेरी माँ के बिच एक अलग ही तरह का प्यार था आकर्षण था , जो हमेशा ही बना रहा । जब से मैंने दुनिया को देखना सिखा , चलना सिखा अपने पास केवल अपनी माँ को ही पाया। लगता था जैसे उनके पास मुझे हर ख़ुशी मिल जाती थी । सायद इसिलिय आज तक मेरी कोई दोस्त नहीं हे । क्योंकि सायद मुझे कभी किसी की जरुरत ही महसूस नहीं हुई। हम माँ बेटी से ज्यादा एक दुसरे के दोस्त थे । लेकिन जय आज जब मेरी माँ इस दुनिया को छोढ़ चली गयी हे तो में कितनी अकेली महसूस करती हु । आज मैं दो बेटियों की माँ हूँ। एक माँ होकर माँ को अच्छी तरह समझ पा रही हूँ। मैं चाहती हूँ कि जिस तरह मेरा और मेरी माँ का रिश्ता था, उसी तरह मेरा और मेरी बेटियों का रिश्ता रहें। लेकिन वह रिश्ता मजबूत होना चाहिए, कमजोर नहीं। मेरी बडी बेटी बहुत भावुक है। बिल्कुल मेरी तरह। और उससे भी ज्यादा भावुक और दिल से सोचने वाली। थोडा 

Mannu bhandari

आज मन्नू भंडारी जी की कहानी स्त्री सुबोधिनी पढ़ी। वैसे यह कहानी पहले भी पढ़ी थी। जितनी बार पढ़ती हूँ, उतनी ही बार कुछ नया लगता है। सबसे बड़ी खास बात लगती है कि उनकी कहानी पात्रों के इर्द-गिर्द नहीं घूमती। स्पष्ट तरीके से लिखती है। यह कहानी भी वैसी ही है। नाम से ही स्पष्ट है कि ज्ञान देने वाली स्त्री। यह एक चिट्ठी है, अपनी प्यारी बहनों के नाम। आज के समय में तो चिट्ठी का नामों निशान नहीं। इसलिए यह और भी ज्यादा प्रासंगिक है। इसके माध्यम से आज की लड़कियों को चिट्ठी का ज्ञान भी होगा। और सबसे बड़ी बात है कि लड़कियाँ जो कम उम्र की होती है, शादीशुदा आदमी से प्रेम कर बैठती है। शादीशुदा इंसान उसके भोले भाले मन का बहुत अच्छे से फायदा उठाता है। वह बहुत ही साधारण भाषा में स्कूल, कालेज में पढ़ने वाली लड़कियों को बताना चाहती है कि जब वह नौकरी में आयीं, तो उनको अपने ही बॉस शिंदे से प्रेम हो गया। पुरुष अपना घर, परिवार बचाते हुए ही बाहरी प्रेम कैसे जिंदा रखते हैं। वह अपनी मीठी-मीठी बातों से कम उम्र की लड़कियों का दिल ले लेते हैं और उनकी भावनाओं के साथ खेलते रहते हैं। शिंदे उम्मीद दिलाता रहता है कि वह सा...

इशारा काफी है

द्विशा शर्मा के नाम से आप सब परिचित हो ही होंगे। हमारे यहाँ लड़कियों के नाम कुछ भी हो, लेकिन किस्मत मिलती-जुलती ही है। अनपढ़ रहो, गृहिणी रहो, नौकरी करो, बेवकूफ रहो या स्मार्ट नतीजा एक ही। यानी या तो मार दिया जायेगा, या मरने के लिए विवश कर दिया जायेगा। दोनों ही स्थिति में परिजन बच नहीं पायेंगे। पति तो बिल्कुल भी नहीं। इसीलिए पुरुष वर्ग को अब सचेत हो ही जाना चाहिए, कि स्थिति चिंताजनक है। अगर तुम एडजस्ट नहीं कर पा रहे हो और लड़की स्मार्ट निकली तो तुम्हारे लिए पहाड़, ड्रम, सूटकेस तो है ही, उसके अलावा भी बहुत रास्ते हो सकते हैं। और अगर तुमने पत्नी को ही टाटा-बाय बाय कर दिया तो फिर तो तुम्हारे लिए जेल के दरवाजे, सोशल साइट्स और न्यूज चैनल ही तुम्हारा संसार होगा। मसलन तुम्हारे पास दो साफ-साफ रास्ते हैं, कि अगर जिंदगी चाहते हो तो समझदारी से, प्यार से, अपनी पत्नी के पास बैठिये, उसकी बातों को ध्यान से सुनिये। उसकी समस्या को सुनिये और मिल-जुल कर समाधान निकालिये। इससे आप भी सुरक्षित रहेंगे, आपका परिवार भी और सब अच्छी जिंदगी जी लेंगे। अगर परिवार में आपके बूढ़े मा-पिता हैं, तो उनका बुढ़ापा अच्छे से ब...

अर्द्धशतक

अर्द्धशतक यानी 50 साल। जी हाँ, मेरे जीवन का अर्द्धशतक चल रहा है। चल रहा है इसलिए बोल रही हूँ, कि मैं इसको कभी-कभी इंजाय करती हूँ, तो कभी कभी लगता है कि यह 50 साल बहुत कष्ट में बीता। मैं बहुत ज्यादा अच्छी जिंदगी की आस में थी, लेकिन न जाने क्यूँ मुझे वैसी जिंदगी नहीं मिल पाई, जो मैं सोची थी। यह भी बात सही है कि सोचना और पाना दोनों अलग अलग मुद्दा है। सोचने के लिए तो सभी अच्छा ही सोचते हैं, खुद के लिए। लेकिन कितना कर पाते हैं, कितना पाते हैं यह मामला ही बड़ा मामला है। मेरे ख्याल से मेरे जीवन का 50 साल बेकार ही गया है। कुछ भी अर्जित नहीं कर पाई। ना अपने अंदर, और ना ही बाहर। कभी-कभी मैं सोचती हूँ कि अगर मैं मरी तो मुझे चार लोग मिलेंगे भी नहीं। कभी यह भी सोच लेती हूँ कि क्या मुझे कोई याद भी करेगा या नहीं। फिलहाल तो मुझे यही लगता है कि मेरे जीते जी ही मेरा जीवन बेकार है, तो मैं कैसे सोचती हूँ कि मेरे मरने के बाद क्या होगा। पिछले पचास साल में मैंने एक भी काम ऐसा नहीं किया जिससे सुकून मिले। ना ही किसी लायक हो पाई, ना ही मैं किसी से बेइंतहा मोहब्बत की, न ही कोई मुझे दीवाने की तरह प्यार किया। सुबह...

हवा

मैं कोई फूल नहीं जो कोई मुझको तोड़ ले मैं कोई पत्थर नहीं जो रस्सी के आने-जाने से घिस जाऊँ मैं तो हवा हूँ अगर रुक गई तो सबका दम घुंटने लगेगा मैं तो हवा हूँ अगर रुक गई तो सबका दम घुंटने लगेगा

दो शब्द , हमारे रिश्ते को

जब मैं बलाका में शिफ्ट हुई, तब केवल परिवार के नाम पर हम दो ही थे पति-पत्नी। एक दिन जब मैं आफिस जाने के लिए निकल रही थी, तो यानी नीचे की तरफ सीढ़ी से उतर रही थी तो एक सज्जन दिखें। वे मुझे देखकर एक अच्छी सी बड़ी सी स्माइल किये, और बोले कि मेरा गैस सिलेंडर आने वाला है और मेरे पास अभी रुपये नहीं है। क्या आप मुझे 500 रुपये दे सकती हैं। मैं उनको पहचानती नहीं थी। आज के पहले देखी भी नहीं थी इसलिए मुझे कुछ अटपटा-सा लगा। मैं सोचने लगी कि क्या करूँ किसी को ना करना अच्छा नहीं लगता। लेकिन उनको जानती नहीं हू इसलिए रुपये देने में भी हिचकिचाहट हो रही थी। लेकिन उनका व्यक्तित्व इतना जबरदस्त था कि क्या बताऊँ, ऊँचा कद, हैंडसम व्यक्तित्व, उम्र 65 के पार होगी, लेकिन उम्र का कोई असर नहीं, बल्कि एक युवा के बगल में खड़ा कर दिया जाए तो भी यहीं बीस लगेंगे। बातचीत में इतने शालीन कि विनम्र होकर बोले कि आप घबराइये नहीं, मेरा फ्लैट नीचे है। मैं आपको शाम को रुपया वापस कर दूंगा। मैं बोली कि रुपये तो अभी मेरे पास नहीं है,. ठीक है घर जाकर लाकर देती हूँ। और फिर शाम को जब मैं आफिस से आई और उसके तुरंत बाद ही वह 500 रुपये ल...

ऑटो-यात्रा

र से ऑफिस और ऑफिस से घर आना-जाना भी एक यात्रा है। छोटी पर दैनिक यात्रा। घर के सारे काम जल्दी-जल्दी निपटाकर, तैयार होकर ऑफिस निकलना, जहाँ थकान भर देता है वहीं ऊर्जा भी देता है। इस दौरान कई चेहरे और कई बातें होती रहती है। कुछ तो दिल दिमाग में बस जाता है तो कई बातों पर ध्यान ही नहीं जाता। कभी कुछ अच्छा लगता है तो कुछ बातें तकलीफ पहुँचा देती है। सफर के दौरान बहुत कुछ जानने और सीखने को भी मिलता है। मैं इस दौरान की कुछ बातें आप सभी के साथ शेयर करना चाहती हूँ। बात पिछले दिनों की है। ऑफिस से घर लौटने के क्रम में मैं जब ऑटो स्टैंड के पास पहुँची तो एक लड़की दौड़ती हुई ऑटो की तरफ लपकी और झट से किनारे की सीट पर बैठ गई। वह जल्दी में लग रही थी। उसके बाद एक पुरुष (55-60 साल) बैठे और किनारे की तरफ मैं बैठ गई। सामने की तरफ एक लड़का के बैठते ही चालक ने वाहन को स्टार्ट कर दिया। वह लड़की, जिसकी उम्र 23-24 के आस-पास रही होगी। देखने से लग रहा था कि अभी-अभी पढ़ाई पूरी कर नौकरी की दुनिया में प्रवेश की है। वह मोबाइल से किसी से बात कर रही थी कि एक लड़का पिछले कई दिनों से उसका पीछा कर रहा है। इसके पहले वह जिस ऑट...

वैलेंटाइन डे

आज बचपन की कुछ बातें याद आ गई। बात यह थी कि उस समय हमारे घर में पापा ऑफिस से सीधे घर आ जाया करते थे। यानी शाम को सात बजे के करीब वह घर आ जाया करते थे। हाँ,जब वह कोलकाता से बाहर है, तो उसकी बात दूसरी। हाँ, तो मैं बोल रही थी कि शाम सात बजे से सुबह नौ बजे यानी जब उनका कार्यालय जाने का समय होता तब तक का समय हमलोग साथ में बिताते थे। उस समय पापा अपना काम, आराम, और भी बहुत कुछ किया करते थे। हमलोग पढ़ाई, घर का हल्का फुल्का काम, और खेलना जैसा बड़ा काम करते रहते थे। माँ भी अपने काम में व्यस्त रहती थी। यानी सब अपने अपने काम में व्यस्त। लेकिन सबको सबका साथ। और आसपास के चाचा-चाची,भैया-भाभी अगर शाम को घर आ गये, तो अच्छा खासा अड्डा जम जाता था। बहुत सारी बातें होती थी, पकौड़ी छनने लगता था, लूडो भी शुरू हो जाता था । घर में अपनापन, सुख का एक माहौल होता था। भरपूर बातचीत का समय मिलता था। हम सब साथ होते थे। आपस में बहुत सारी बातें होती थी। पापा के आने के बाद माँ भी रिलेक्स होती थी। उनके चेहरे पर सुकून और शांति होती थी। बच्चों के चेहरे पर खुशी और अपनेपन का माहौल होता था। सब साथ-साथ होते थे। कई बार नोंक-झोंक...

दिल की बात

जो चाहा, पाई नहीं, जो पाई वह चाही नहीं। जिसका सपना देखी, वह हकीकत बन नहीं पाया। जो हकीकत में है, उसको अपना नहीं पाई। अकेले रहना अच्छा नहीं लगता। लोगों का साथ मिलता नहीं। कोई मुझे समय देता नहीं, मेरा समय किसी को चाहिए नहीं। मैं किसी की दीवानीं नहीं, कोई मेरा चाहनेवाला नही। मैं इतनी गरीब नहीं, कि मैं गरीब का लेबल लगाकर घूमूँ। और अमीर भी इतनी नहीं कि शान, शौकत से रह सकूँ। छोटा सा प्यारा परिवार है, लेकिन बुजुर्ग की कमी है। लोगों से दूर हूँ, पर किसी से अंजान नहीं। मसलन,मसलन न जाने कितनी बातें हैं और कुछ भी बातें नहीं। बातें बहुत है पर सुनने वाला कोई नहीं। दिल की तो एकदम नहीं। काम मैं ज्यादा कर नहीं पाती,इसलिए काम से मैं दूर ही रहती हूँ। दिल की बात दिल में है। दिल के बाहर की बात भी कोई नहीं करने वाला। मेरे अकेलेपन को मैं दिन दुनी रात चौगुनी बढ़ाती रहती हूँ।

छुट्टी और मैं

सोची थी कि इस बार की दुर्गापूजा को मैं खास बनाऊेंगी। खूब घूमूंगी। कोलकाता के चप्पे चप्पे पर होने वाले पूजा पंडाल को देखूंगी। थोड़ा ज्यादा ही सोच रही थी, लेकिन इच्छा थी कि इस वर्ष दुर्गापूजा में खूब घुमुंगी। कोलकाता के जिस इलाके में कभी रहा करती थी,जैसे हावड़ा, बालीगंज, टालीगंज, बांगुड़ समेत न जाने कितने इलाके में घूमना था, और हाँ हमारा अपना न्यू टाउन वहाँ भी घूमना था। सोची थी कि दस दिनों की इस छुट्टी में एक दिन भी घर में नहीं रहूँगी। पहले पूजा पंडाल घूमूंगी, माँ दुर्गा के दर्शन करूँगी। लाइटिंग देखूंगी। और उसके बाद कोलकाता के कई मंदिरों में भी जाऊँगी। घूमूंगी, खूब खाऊँगी। अगर कोई मिला तो किसी केसाथ जाऊंगी, अगर कोई नहीं मिला तो अकेले ही निकल पडूंगी। लेकिन दुर्गापूजा के आते ही मैं बीमार पड़ गई और पूरे नौ दस दिन बीत गये, खांस-खाँस कर बिस्तर पर पड़ी रही।बुखार में तड़पती रही। शुरुआत में दवा न खा की जिद्द पर पड़ी रही, बाद में दवाइयों का हीसहारा लेना पड़ा। बस यूँ ही बीत गया मेरा छुट्टी और रफूचक्कर हो गया मेरा घूमने का प्रोग्राम। इसी का नाम जिंदगी है।

मैं और मेरी तन्हाई

मैं जितनी अजीब मेरी तन्हाई उससे भी अजीब। मैं जितनी उलझी, मेरी तन्हाई उससे भी ज्यादा उलझी। दोनों आपस में लड़ते रहते हैं।अक्सर मैं जीत जाती हूँ, तोकभी कभी तन्हाई भी जीत जाती है। मैं मतलब मैं। मैं मतलब अहंकार वाला मैं नहीं। मेरा वाला मैं। यानी रेखा श्रीवास्तव वाला मैं। इस मैं का कहना है कि कुछ करो,खूब घूमो, लाइफ को इंजाय करो। लेकिन वहीं मैं का एक ओर हिस्सा है वह कुछ भी करने नहीं देता।जबकि वह चारों ओर सबको सबकुछ करते देख कर बहुत खुश होता है, लेकिन हिम्मत है कि वह कुछ कर लें, या करने दें। इसी कशम्कश में मैं उलझी जाती हूँ। उलझी रहती हूँ। मैं क्या चाहतीहूँ, क्या करती हूँ, क्या नहीं करती हूँ। बहुतमुश्किल हो रहा है। और उस पर से मेरी तन्हाई। वह तो मुझे पसंद नहीं, इसलिए मुझे जीने भी नहीं देती। सोचिए कि मेरी क्या स्थिति है।

बातचीत

घर से ऑफिस और ऑफिस से घर आना-जाना भी एक यात्रा है। छोटी पर दैनिक यात्रा। घर के सारे काम जल्दी-जल्दी निपटाकर, तैयार होकर ऑफिस निकलना, जहाँ थकान भर देता है वहीं ऊर्जा भी देता है। इस दौरान कई चेहरे और कई बातें होती रहती है। कुछ तो दिल दिमाग में बस जाता है तो कई बातों पर ध्यान ही नहीं जाता। कभी कुछ अच्छा लगता है तो कुछ बातें तकलीफ पहुँचा देती है। सफर के दौरान बहुत कुछ जानने और सीखने को भी मिलता है। मैं इस दौरान की कुछ बातें आप सभी के साथ शेयर करना चाहती हूँ। बात पिछले दिनों की है। ऑफिस से घर लौटने के क्रम में मैं जब ऑटो स्टैंड के पास पहुँची तो एक लड़की दौड़ती हुई ऑटो की तरफ लपकी और झट से किनारे की सीट पर बैठ गई। वह जल्दी में लग रही थी। उसके बाद एक पुरुष (55-60 साल) बैठे और किनारे की तरफ मैं बैठ गई। सामने की तरफ एक लड़का के बैठते ही चालक ने वाहन को स्टार्ट कर दिया। वह लड़की, जिसकी उम्र 23-24 के आस-पास रही होगी। देखने से लग रहा था कि अभी-अभी पढ़ाई पूरी कर नौकरी की दुनिया में प्रवेश की है। वह मोबाइल से किसी से बात कर रही थी कि एक लड़का पिछले कई दिनों से उसका पीछा कर रहा है। इसके पहले वह जिस ऑ...

प्रेसिडेंसी में आठ साल का सुहाना सफर

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कल 4 जनवरी 2024 है। यानी कल मुझे प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय से जुड़े 8 साल हो जायेंगे। आठ साल पहले मैं यहां के हिंदी विभाग से जुड़ी थी। वहां का परिवरा बहुत अच्छा था। माँ बनने के बाद मेरे जीवन की यह दूसरी पारी की शुरूआत थी। पहले पारी में मैं हिन्दी अखबारों की दुनिया से जुड़ी थी। महानगर से होते हुए प्रभात खबर की यात्रा की थी। अखबार की दुनिया में ग्लैमर, नाम, पहचान बहुत कुछ था। चूंकि मैंने रिपोर्टिंग भी की थी, फीचर भी जमकर लिखा था। फिल्मी दुनिया पर भी लिखा। इसलिए मुझे वह सफर बहुत अच्छा लगा था। लेकिन पारिवारिक जिम्मेदारियों की वजह से उस दुनिया को अलविदा कहना पड़ा। लगभग सात साल बाद 2014 में दूसरी पारी की शुरूआत फिर से अखबार की दुनिया से की थी, लेकिन पारिवारिक जिम्मेदारियों के लिए अखबार में नौकरी करना नामुमकिन लगा। इसलिए समझ में आ गया कि पारिवारिक जिम्मेदारियों के लिए अखबार की दुनिया को छोड़कर कहीं न कहीं सुबह दस से शाम पांच –छह बजे तक की ही नौकरी करनी पड़ेगी। इसी क्रम में 2016 में प्रेसिडेंसी से जुड़ गई। यह मेरे लिए सौभाग्य की बात थी। जहां लोग पढ़ने का सपना देखते हैं, वहां मुझे जुड़ने का मौक...

आज 17 मई है

आज 17 मई है। मम्मी-पापा की सालगिरह है, पर सबसे दुख की बात है कि आज दुनिया में दोनों ही नहीं है। पापा 2002 के सितंबर महीने में और माँ 17 फरवरी 2009 में एक अलग दुनिया में चली गयीं। उम्मीद करती हूँ कि अभी दोनों जहाँ भी होंगे, साथ होंगे और खुश होंगे। आप दोनों को सालगिरह की बहुत-बहुत बधाई। पापा अपने सालगिरह को लेकर काफी उत्साह से भरे रहते थे। ऐसे मौके पर माँ, पापा की तुलना में कम खुशियाँ दिखा पाती थीं। वह अपनी खुशी और दुख दोनों ही अपने तक सीमित रखती थीं। पापा का खुश होना, फोटो खिंचवाना, कुछ खास भोजन की चाह रखना, हम सब के लिए मिठाई लाना आज भी याद है। पापा को कभी गुस्सा करते नहीं देखी। उत्तेजित होते भी नहीं देखी। उनका व्यक्तित्व हंसमुख और जिंदादिल था। लोग उन्हें मस्तमौला कहते थे। लेकिन धुन के पक्के थे। वह जो तय करते थे, वही करते थे। उनका कहना था कि सुनो सब की, करो मन की। वह बहुत मिलनसार थे। वहीं, माँ के जीवन का फैसला पापा करते थे, उसके बाद बड़े भैया करने लगे। लेकिन कुछ फैसले वह खुद करती थी। मसलन, कब उन्हें फिल्म देखने जाना है, तो कब उन्हें बाजार जाना है। खाने और घूमने की शौकीन थी, तो वहीं स्व...
अहसास खुशी का… जीवन में खुशी और गम कब आ जायें, और कब चला जाये इसके बारे में कभी कोई नहीं बता सकता है। पर यह क्रम पूरे जीवन में चलता ही रहता है। वैसे मेरे जीवन में आजकल एक अलग तरह की खुशी का दौर चल रहा है। शायद यह दौर सभी के जीवन में आता होगा, पर मेरे जीवन में यह आने से अचानक इतनी खुशी हो रही है कि मन गद्गद् हो जाता है। यह खुशी है खुद के बड़े होने का, और ऐसा लग रहा है कि मेरे सामने मेरे छोटे अचानक बड़े होकर सामने खड़े हो गये हैं और मैं गद्गद् होकर खुश होकर उनको आशीष दे रही हूँ। पिछले एक-दो साल से ही ऐसा चल रहा है, पर फिलहाल काफी खुशी हो रही है। वैसे पहली बार इसका अनुभव तो 2008 में ही हुआ था। जब किंशुक का क्लास टेन का रिजल्ट फोन पर मैं पहली बार सुनी थी। खुशी के मारे आँखों से आँसू बहने लगे थे, पर जल्दी ही अपने आंसू को रोक कर सामान्य होने की कोशिश की। उसके बाद तो फिर बहुत लंबा समय हो गया। कई साल पहले जब मैं 14-15 साल की थी, तो पापा के साथ रिश्तेदारों के यहाँ (खासकर मामा) के यहाँ जाना होता था। वहाँ बहुत छोटे –छोटे बच्चे थे। किसी की मौसी, किसी की बुआ थी। फिर सब अपने-अपने में जीवन में जैसे व...

मोबाइल

  एक समय ऐसा भी था जब अपनों से बात करने के लिए लोग बहुत तड़पते थे। एसटीडी बूथ पर लोग लंबी लाइन में खड़े रहते थे। एसटीडी कॉल करने के लिए घ़ड़ी के कांटों का बहुत इंतजार किया गया था। रात आठ बजे से बिल आधा आयेगा, तो रात में दस बजे के बाद उसका भी आधा। इसलिए उस समय पर फोन किया जाता था। गांव हो या शहर, सभी ने एक कॉल करने के लिए काफी मशक्कत की है। ऑफिस में काम करने वाले भी आसानी से अपने घर फोन नहीं कर पाते थे। घर पर फोन करने के लिए मौका तलाशा जाता था, कि कहीं मौका मिले और अपने घर वालों से दो शब्द बातें कर लें। फोन पर ज्यादा देर तक बात करने वाले को एक अलग ही दृष्टि से देखा जाता था। किसी के टेबल पर लैंड लाइन का होना जैसे कुबेर का खजाना मिल गया हो। जिसके घर में भी फोन यानी लैंडलाइन होता था, पड़ोसियों के सामने उसका रुतबा बहुत अच्छा होता था। पड़ोसियों के कॉल आने पर उसको बुलाकर बात करवा देना, जैसे कितना बड़ा काम होता था। इसके लिए जिसके घर में फोन होता था, उससे कभी कोई झगडा या मनमुटाव नहीं करता था। अच्छी हो या बुरी खबर, दोनों के लिए फोन बहुत बड़ा सहारा होता था। आज की तरह नहीं, कि कुछ भी हुआ, कॉ...

लिखना जरूरी है

 लिखना जरुरी है बहुत जरुरी है उतना ही  जितना सांस लेना लिखना जरुरी है बहुत जरुरी है उतना ही जितना जीने के लिए खाना  लिखने से मिल जाती है तृप्ति वैसे ही जैसे प्यासे को पानी पीने से  लिखना अनवरत जारी  रहेगा तब तक जब तक सबेरा होता रहेगा शाम होती रहेगीं  रात होता रहेगा तब तक लिखना चलता रहेगा
एक चेहरे पर कई चेहरे लिए लोग घूम रहे हैं कौन सच्चा, कौन झूठा भ्रमित है लोग अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग चेहरे कैसे जमाये हैं लोग लोगों को लोगों से  लड़ा कर खुद को तृप्त महसूस कर रहे हैं लोग ऊँचे औहदे तक पहुँचने के लिए कितने नीचे गिरते जा रहे हैं लोग फिर भी सकून की नींद सो पा रहे हैं लोग ज्यादा पाने की चाह में, लोगों से बहुत कुछ छिनते जा रहे हैं लोग रोज सुबह एक नयी तरकीब ढूँढ रहे हैं लोग शाम को उनके फायदे-नुकसान का चिट्ठा तैयार कर रहे हैं लोग अपने को साबित करने के लिए कितनों को गलत ठहरा रहे हैं लोग लोग ही है जो लोगों को लोगों के खिलाफ जहर भर रहे हैं 

चलते-चलते चले गये थे मेरे भैया

सही में चलते-चलते चले गये थे मेरे भैया। चलना ही उनका मुख्य काम था। वैसे कहा जाए कि उन्हें चलने का जुनून था, तो गलत नहीं होगा। एक दिन में कितना चल लेते थे, शायद उन्हें भी पता न हो। एक समय था जब वह कई महीने चल नहीं पाये थे, तब वह कितने बेचैन थे, मैंने महसूस किया था। वो नहीं चल पा रहे थे, उनका दर्द मुझे भी बहुत था। कई महीनों बाद जब वह चले थे, तो लगा जैसे मैं भी चल पड़ी। किसी का भी चलना बहुत फायदेमंद है। पर चलते चलते चला जाना। इसे क्या कहूँ। पल भर में तो वह चले गये इस दुनिया से उस दुनिया में। ना खुद परेशान हुए और ना ही किसी को परेशान किये।  अगर वह बीमार होते, बिस्तर पर पड़े रहते तो मुझे बहुत तकलीफ होती। उससे तो अच्छा ही हुआ कि वह चलते चलते चले गये। वैसे उनकी कमी खलती है। जब तक हम है आप मेरे साथ रहेंगे। साल भर हो गए उनको गए। उनकी कमी आज भी खलती है। मुझे एक बच्चे की तरह प्यार करने वाले, मेरा ख्याल रखने वाले मेरे भैया मेरे लिए बहुत खास थे। बिन बोले कैसे मुझे समझ जाते थे, आजतक मैं नहीं समझ पाई। कैसे वह मेरी खुशी समझ जाते थे, और कैसे मेरे दुख को महसूस कर लेते थे। मैं हंसती तो वह भी हंस देते,...